मूकनायक से डिजिटल न्यूज़रूम तक बदली पत्रकारिता की तस्वीर, लेकिन प्रतिनिधित्व, अवसर और संपादकीय स्वतंत्रता की चुनौती आज भी कायम
19 अगस्त, ऑनलाइन डैस्क।
डी० पी० रावत: विशेष रिपोर्ट।
🔥 भूमिका: जब खबर सिर्फ खबर नहीं, आवाज भी बन जाती है
भारत में पत्रकारिता का इतिहास केवल सत्ता, राजनीति और घटनाओं की रिपोर्टिंग का इतिहास नहीं है। यह उन आवाजों की कहानी भी है जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत असमानताओं के कारण पर्याप्त जगह नहीं मिल सकी।
इसी संदर्भ में दलित पत्रकारिता को समझना जरूरी है।
दलित पत्रकारिता का अर्थ केवल दलित समुदाय से आने वाले पत्रकारों द्वारा लिखी गई खबरें नहीं है। इसका व्यापक अर्थ उन सामाजिक प्रश्नों को पत्रकारिता के केंद्र में लाना है, जो जातिगत भेदभाव, सामाजिक न्याय, शिक्षा, रोजगार, भूमि, सम्मान, प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े हैं।
आज 2026 में मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, YouTube, वेबसाइट, ब्लॉग और डिजिटल न्यूज़रूम ने पत्रकारिता के प्रवेश-द्वार को पहले की तुलना में काफी व्यापक बनाया है। लेकिन सवाल अभी भी वही है—क्या मीडिया में समाज के सभी वर्गों की आवाज और निर्णय लेने वाली जगहों पर समान भागीदारी है?
UNESCO के अनुसार मीडिया विविधता का मतलब समाज की अलग-अलग सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टियों को समाचार सामग्री में उचित रूप से प्रतिबिंबित करना है। UNESCO यह भी रेखांकित करता है कि समान अवसर वाली मीडिया संस्थागत व्यवस्था विविध कार्यबल और अधिक संतुलित पत्रकारिता के लिए महत्वपूर्ण है।
🕰️ तब: जब अपनी बात कहने के लिए अपना अखबार निकालना पड़ा
भारतीय पत्रकारिता में डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का योगदान इस बहस का महत्वपूर्ण अध्याय है।
सरकारी स्रोतों के अनुसार आंबेडकर ने वंचित वर्गों की आवाज को सार्वजनिक विमर्श तक पहुंचाने के लिए 'मूकनायक' का प्रकाशन शुरू किया। बाद में 'बहिष्कृत भारत' भी उनके सामाजिक और वैचारिक अभियान का महत्वपूर्ण माध्यम बना।
'मूकनायक' नाम अपने आप में बहुत कुछ कहता है—अर्थात वह व्यक्ति या समुदाय जिसकी आवाज समाज में पर्याप्त रूप से नहीं सुनी जा रही थी।
1927 में 'बहिष्कृत भारत' की शुरुआत भी इसी व्यापक उद्देश्य से जुड़ी थी। सरकारी अभिलेखों में इसका उल्लेख मिलता है।
इस दौर में पत्रकारिता केवल समाचार प्रकाशित करने का माध्यम नहीं थी। यह सामाजिक चेतना, शिक्षा और अधिकारों की लड़ाई का साधन भी थी।
📌 उस दौर की पत्रकारिता की प्रमुख विशेषताएं
- सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध आवाज।
- शिक्षा को परिवर्तन का आधार बनाना।
- संवैधानिक अधिकारों की समझ विकसित करना।
- वंचित समुदायों को अपनी बात स्वयं कहने का मंच देना।
- सामाजिक सुधार को सार्वजनिक बहस का विषय बनाना।
- सत्ता और समाज दोनों से सवाल पूछना।
इसलिए दलित पत्रकारिता का इतिहास भारतीय लोकतंत्र के विकास से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
📱 अब: डिजिटल युग ने बदला पत्रकारिता का प्रवेश-द्वार
21वीं सदी में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला है।
पहले अखबार निकालने के लिए प्रेस, पूंजी, वितरण नेटवर्क और बड़ी संस्थागत व्यवस्था की जरूरत होती थी। आज एक पत्रकार स्मार्टफोन, इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से रिपोर्ट तैयार कर सकता है और उसे हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है।
डिजिटल युग के नए माध्यम
- 📰 ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल
- ▶️ YouTube
- 🎙️ Podcast
- 🗣️ X
- 💬 WhatsApp Channel
- 📢 Telegram
- ✍️ Blogger और अन्य वेबसाइट प्लेटफॉर्म
यह बदलाव खास तौर पर उन समुदायों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्हें पारंपरिक मीडिया संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने की शिकायत रही है।
2025 में चेन्नई में SC/ST विद्यार्थियों के लिए आयोजित पत्रकारिता कार्यशाला के संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार एन. राम ने मुख्यधारा मीडिया में दलित प्रतिनिधित्व को अभी भी अपर्याप्त बताया था। उसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सोशल मीडिया और YouTube पर स्थिति कुछ बेहतर हुई है, हालांकि इसे पर्याप्त नहीं माना गया।
यह एक महत्वपूर्ण संकेत है—डिजिटल मीडिया ने आवाजों की संख्या बढ़ाई है, लेकिन समान प्रतिनिधित्व की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
📊 भारत का सामाजिक संदर्भ: आंकड़े क्या बताते हैं?
भारत की सामाजिक संरचना को समझे बिना दलित पत्रकारिता को पूरी तरह समझना मुश्किल है।
2011 की जनगणना के आधार पर भारत में अनुसूचित जाति की आबादी 20.14 करोड़ के आसपास, यानी कुल आबादी का लगभग 16.63% थी। यह आंकड़ा भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के प्रकाशन में दिया गया है।
🇮🇳 प्रमुख आंकड़े
| विषय | उपलब्ध आंकड़ा |
|---|---|
| भारत की कुल आबादी, 2011 | लगभग 121.09 करोड़ |
| अनुसूचित जाति आबादी | लगभग 20.14 करोड़ |
| राष्ट्रीय आबादी में SC हिस्सा | 16.63% |
| हिमाचल प्रदेश की आबादी, 2011 | लगभग 68.65 लाख |
| हिमाचल में SC आबादी | लगभग 17.29 लाख |
| हिमाचल में SC हिस्सा | 25.19% |
हिमाचल प्रदेश के लिए 2011 के सरकारी आंकड़ों में अनुसूचित जाति आबादी 17,29,252 और कुल आबादी में उसका हिस्सा 25.19% बताया गया है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि पत्रकारिता में भी ठीक 25.19% प्रतिनिधित्व होना चाहिए। जनसंख्या प्रतिशत और मीडिया प्रतिनिधित्व दो अलग-अलग सांख्यिकीय अवधारणाएं हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इतने बड़े सामाजिक समूह की समस्याओं, उपलब्धियों और दृष्टिकोणों को मीडिया में कितनी विविधता और गहराई से जगह मिलती है।
🏔️ हिमाचल प्रदेश के संदर्भ में क्यों महत्वपूर्ण है यह बहस?
हिमाचल प्रदेश को अक्सर शांत, पहाड़ी और अपेक्षाकृत सामाजिक रूप से समावेशी राज्य के रूप में देखा जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि यहां सामाजिक असमानता या प्रतिनिधित्व के प्रश्न समाप्त हो गए हैं।
2011 Census के आधिकारिक आंकड़ों में हिमाचल प्रदेश के प्रत्येक जिले के अनुसूचित जाति संबंधी अलग-अलग आंकड़े उपलब्ध हैं। इनमें कुल्लू, मंडी, शिमला, कांगड़ा, सिरमौर, सोलन, चंबा, हमीरपुर, ऊना, बिलासपुर, किन्नौर और लाहौल-स्पीति जैसे जिले शामिल हैं।
ग्रामीण हिमाचल में पत्रकारिता का एक विशेष महत्व है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पंचायत, भूमि, वन अधिकार, सरकारी योजनाएं और स्थानीय प्रशासन से जुड़े मुद्दे अक्सर राष्ट्रीय मीडिया की प्राथमिकता नहीं बनते।
यहीं स्थानीय पत्रकारिता की भूमिका सामने आती है।
🏔️ हिमाचल की स्थानीय पत्रकारिता के लिए 5 महत्वपूर्ण क्षेत्र
- ग्रामीण और पंचायत स्तर की खबरें
- शिक्षा और रोजगार
- सामाजिक न्याय और सरकारी योजनाएं
- स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही
- युवा और डिजिटल पत्रकारिता
इसलिए हिमाचल में दलित पत्रकारिता को केवल 'जाति आधारित पत्रकारिता' के रूप में देखने के बजाय स्थानीय लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के व्यापक संदर्भ में देखना अधिक उपयोगी है।
⚖️ संविधान और पत्रकारिता: अधिकार बनाम जिम्मेदारी
भारत का संविधान समानता और गैर-भेदभाव का मूल आधार प्रदान करता है।
संविधान के अनुच्छेद 15 में राज्य द्वारा धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा का प्रावधान है। अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता से जुड़ा है।
पत्रकारिता का दायित्व केवल किसी समुदाय के साथ होने वाले भेदभाव की खबर प्रकाशित करना नहीं है।
पत्रकारिता को यह भी देखना चाहिए कि खबर लिखते समय स्वयं पत्रकारिता की भाषा भेदभावपूर्ण न हो।
इसीलिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पत्रकारिता आचरण मानकों में जाति, धर्म और समुदाय के संदर्भों को लेकर सावधानी पर जोर दिया गया है। विशेष रूप से किसी अपराध की रिपोर्टिंग में आरोपी या पीड़ित की जाति का उल्लेख तभी उचित है जब उसका घटना से वास्तविक संबंध हो।
📝 पत्रकार के लिए सरल नियम
जाति बताना खबर नहीं है।
जाति से जुड़ा तथ्य खबर तभी है जब उसका घटना से वास्तविक संबंध हो।
उदाहरण:
❌ "फलां जाति का व्यक्ति गिरफ्तार"
यदि जाति अपराध से संबंधित नहीं है तो यह अनावश्यक पहचान हो सकती है।
✅ "पुलिस ने फलां मामले में आरोपी को गिरफ्तार किया"
लेकिन यदि मामला ही जातिगत भेदभाव, अत्याचार या सामाजिक बहिष्कार से संबंधित है, तो जाति-संबंधी तथ्य समाचार के मूल संदर्भ का हिस्सा हो सकता है।
🔍 दलित पत्रकारिता: तब और अब का अंतर
| पहलू | तब | अब |
|---|---|---|
| माध्यम | समाचार पत्र, पत्रिका | वेबसाइट, सोशल मीडिया, YouTube |
| प्रवेश लागत | अपेक्षाकृत अधिक | बहुत कम हो सकती है |
| वितरण | प्रिंट नेटवर्क | इंटरनेट |
| पाठक | क्षेत्रीय/सीमित | वैश्विक |
| प्रकाशन नियंत्रण | संपादकीय संस्थान | अधिक स्वतंत्र विकल्प |
| गति | धीमी | लगभग तत्काल |
| प्रतिक्रिया | पत्र/संपादकीय प्रतिक्रिया | Comment, Share, Like |
| जोखिम | आर्थिक व सामाजिक दबाव | डिजिटल ट्रोलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न |
| अवसर | सीमित संस्थान | अनेक डिजिटल प्लेटफॉर्म |
| चुनौती | मंच की कमी | विश्वसनीयता और सूचना की गुणवत्ता |
🌐 भारत से विश्व तक: सवाल सिर्फ भारत का नहीं
मीडिया विविधता का प्रश्न वैश्विक है।
UNESCO के अनुसार लोकतांत्रिक समाज में मीडिया को विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों को प्रतिबिंबित करना चाहिए। विविधता केवल कंटेंट में नहीं, बल्कि मीडिया संस्थानों की कार्यप्रणाली और कार्यबल में भी महत्वपूर्ण है।
UNESCO की 2026–2029 की संचार एवं सूचना संबंधी प्राथमिकताओं में स्वतंत्र और बहुलतावादी मीडिया, पत्रकारों की सुरक्षा, सूचना तक पहुंच तथा हाशिये पर रहने वाले समूहों को समावेशी ज्ञान समाज में शामिल करने पर जोर दिया गया है।
अर्थात दुनिया में मीडिया की बहस अब केवल "कितने अखबार हैं?" तक सीमित नहीं है।
आज सवाल हैं—
कौन खबर लिखता है?
किसकी आवाज सुनी जाती है?
किसे विशेषज्ञ माना जाता है?
किसकी समस्या को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाता है?
और किसकी कहानी सिर्फ घटना के समय दिखाई देती है?
💡 दलित पत्रकारिता के सामने आज की 7 बड़ी चुनौतियां
1️⃣ प्रतिनिधित्व
मुख्यधारा मीडिया में विविध सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले पत्रकारों की भागीदारी का प्रश्न अभी भी चर्चा में है। 2025 की ACJ-संबंधित रिपोर्ट में भी दलित प्रतिनिधित्व को अपर्याप्त बताया गया था।
2️⃣ न्यूज़रूम में निर्णय की शक्ति
केवल रिपोर्टर होना पर्याप्त नहीं है। संपादकीय निर्णय लेने वाले पदों पर भी विविधता महत्वपूर्ण है।
3️⃣ आर्थिक संसाधन
स्वतंत्र पत्रकार के लिए कैमरा, यात्रा, इंटरनेट, डेटा, कानूनी सहायता और समय सभी लागत वाले संसाधन हैं।
4️⃣ डिजिटल उत्पीड़न
सोशल मीडिया ने आवाज दी है, लेकिन ऑनलाइन abuse और hate speech भी बढ़ी चुनौती है। UNESCO दक्षिण एशिया के मीडिया वातावरण में ऑनलाइन दुरुपयोग और hate speech को मीडिया विविधता के लिए चुनौती के रूप में रेखांकित करता है।
5️⃣ सनसनी बनाम संवेदनशीलता
जातिगत मुद्दों पर sensational headline सामाजिक तनाव बढ़ा सकती है।
6️⃣ डेटा की कमी
भारत में पत्रकारों की जातिगत संरचना पर नियमित, व्यापक और सार्वजनिक आधिकारिक डेटाबेस उपलब्ध न होने के कारण बड़े-बड़े प्रतिशत दावों को सावधानी से देखना चाहिए।
7️⃣ डिजिटल विश्वसनीयता
नया मीडिया अवसर तो देता है, लेकिन fake news, AI-generated content, edited video और misinformation पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए बड़ी चुनौती हैं।
🛠️ पत्रकारों के लिए सरल Tutorial: जाति-संबंधी खबर कैसे रिपोर्ट करें?
Step 1 — तथ्य की पुष्टि करें
FIR, सरकारी आदेश, न्यायालय रिकॉर्ड, आधिकारिक बयान या प्रत्यक्ष दस्तावेज देखें।
Step 2 — जाति का उल्लेख आवश्यक है या नहीं?
अपने आप से पूछें:
क्या जाति इस घटना को समझने के लिए आवश्यक तथ्य है?
यदि उत्तर 'नहीं' है, तो जाति का उल्लेख न करना बेहतर है।
Step 3 — दोनों पक्ष लें
पीड़ित, आरोपी, प्रशासन, पुलिस और संबंधित संस्था का पक्ष उपलब्ध हो तो शामिल करें।
Step 4 — अपमानजनक शब्दों से बचें
ऐसी भाषा न लिखें जो किसी समुदाय को सामूहिक रूप से अपराधी या पिछड़ा घोषित करे।
Step 5 — headline neutral रखें
Headline में तथ्य रखें, उत्तेजना नहीं।
Step 6 — फोटो का सावधानी से इस्तेमाल करें
पीड़ित या कमजोर वर्ग की गरिमा का ध्यान रखें।
Step 7 — Follow-up करें
केवल घटना प्रकाशित करके छोड़ना पत्रकारिता की पूरी जिम्मेदारी नहीं है। प्रशासन ने क्या किया? जांच कहां पहुंची? पीड़ित को सहायता मिली या नहीं? यह भी खबर है।
🚀 डिजिटल युग में आगे का रास्ता
दलित पत्रकारिता का भविष्य केवल पारंपरिक अखबारों में नहीं है।
यह भविष्य community journalism + digital journalism + data journalism + mobile journalism के संयोजन में दिखाई देता है।
एक ग्रामीण युवा आज अपने मोबाइल से:
🎥 वीडियो बना सकता है।
🎙️ Interview कर सकता है।
📷 फोटो रिपोर्ट तैयार कर सकता है।
📰 Blogger पर रिपोर्ट प्रकाशित कर सकता है।
▶️ YouTube पर वीडियो डाल सकता है।
📱 Facebook पर audience बना सकता है।
📊 सरकारी आंकड़ों से data story बना सकता है।
लेकिन सुविधा के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है।
मोबाइल पत्रकार बनना आसान है; विश्वसनीय पत्रकार बनना कठिन है।
📌 ABD News के लिए संपादकीय दृष्टिकोण
अखण्ड भारत दर्पण (ABD) न्यूज़ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए इस विषय से एक महत्वपूर्ण संपादकीय सिद्धांत निकलता है:
"समुदाय की खबर करें, लेकिन समुदाय को खबर न बनाएं।"
अर्थात व्यक्ति की जाति को सनसनी बनाने के बजाय उसके अधिकार, समस्या, उपलब्धि, संघर्ष और सामाजिक संदर्भ को केंद्र में रखा जाए।
इसी दृष्टिकोण से पत्रकारिता अधिक संवेदनशील और लोकतांत्रिक बन सकती है।
📚 अब और तब से मिलने वाले 8 सबक
- 🗞️ अपनी आवाज के लिए अपना माध्यम जरूरी हो सकता है।
- 📖 पत्रकारिता सामाजिक शिक्षा का माध्यम भी है।
- ⚖️ संविधान पत्रकारिता के लिए समानता का नैतिक आधार देता है।
- 📱 डिजिटल मीडिया ने प्रवेश बाधाएं कम की हैं।
- 🔍 स्वतंत्रता के साथ fact-checking जरूरी है।
- 🧠 जातिगत मुद्दों पर भाषा अत्यंत सावधानी से इस्तेमाल होनी चाहिए।
- 🌐 स्थानीय आवाज वैश्विक audience तक पहुंच सकती है।
- 🤝 प्रतिनिधित्व का अर्थ केवल संख्या नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी भी है।
🔮 निष्कर्ष: मूकनायक से डिजिटल आवाज तक
भारत में दलित पत्रकारिता का इतिहास हमें बताता है कि पत्रकारिता केवल घटनाओं का रिकॉर्ड नहीं है। यह समाज में संवाद, प्रश्न और परिवर्तन का माध्यम भी बन सकती है।
एक समय था जब वंचित आवाजों को अपनी बात कहने के लिए अपना अखबार निकालना पड़ा। आज डिजिटल तकनीक ने प्रकाशन को आसान बनाया है। लेकिन मंच मिल जाना और बराबर प्रतिनिधित्व मिल जाना—दो अलग बातें हैं।
आज चुनौती यह नहीं कि आवाज उठाने के लिए माध्यम उपलब्ध है या नहीं।
चुनौती यह है कि—
क्या आवाज विश्वसनीय है?
क्या रिपोर्ट तथ्यपरक है?
क्या भाषा सम्मानजनक है?
क्या पीड़ित की गरिमा सुरक्षित है?
क्या सत्ता से सवाल पूछा गया?
क्या खबर का दूसरा पक्ष लिया गया?
और क्या पत्रकारिता समाज को जोड़ रही है या बांट रही है?
भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब उसके मीडिया में समाज की विविधता भी दिखाई देगी और सुनी भी जाएगी।
मूकनायक का युग हमें आवाज उठाने की प्रेरणा देता है।
डिजिटल युग हमें उस आवाज को दूर तक पहुंचाने की शक्ति देता है।
अब जिम्मेदारी हमारी है कि उस शक्ति का इस्तेमाल तथ्य, संविधान, मानव गरिमा और पत्रकारिता की मर्यादा के साथ किया जाए। 🇮🇳📰
📊 महत्वपूर्ण Data Note
इस रिपोर्ट में जनसंख्या संबंधी आंकड़े मुख्यतः Census 2011 पर आधारित हैं। भारत में अनुसूचित जाति की आबादी 2011 में 16.63% और हिमाचल प्रदेश में 25.19% दर्ज की गई थी।
महत्वपूर्ण: उपलब्ध आधिकारिक स्रोतों में "भारत के कुल पत्रकारों में दलित पत्रकारों का वर्तमान प्रतिशत" जैसा व्यापक और नियमित 2026 डेटाबेस नहीं मिला। इसलिए सोशल मीडिया पर प्रसारित अप्रमाणित प्रतिशतों को इस रिपोर्ट में तथ्य के रूप में शामिल नहीं किया गया है।
⚠️ Disclaimer
यह विशेष रिपोर्ट ऐतिहासिक स्रोतों, सरकारी आंकड़ों, पत्रकारिता मानकों और उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों के आधार पर तैयार की गई विश्लेषणात्मक सामग्री है। इसमें किसी जाति, समुदाय, धर्म या व्यक्ति के विरुद्ध टिप्पणी करने का उद्देश्य नहीं है। जाति संबंधी आंकड़ों के लिए उपलब्ध Census 2011 तथा सरकारी प्रकाशनों को आधार बनाया गया है। पत्रकारों के जातिगत प्रतिनिधित्व संबंधी जहां आधिकारिक और पर्याप्त वर्तमान आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, वहां अनुमान या अप्रमाणित प्रतिशत को तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। पाठकों को किसी महत्वपूर्ण कानूनी, प्रशासनिक या सामाजिक निर्णय से पहले मूल सरकारी दस्तावेजों की पुष्टि करनी चाहिए। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पत्रकारिता आचरण मानकों का पालन करना समाचार संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण है।
स्रोत/Official Sources:
Press Council of India: https://www.presscouncil.nic.in/
India Code: https://www.indiacode.nic.in/
Census of India: https://censusindia.gov.in/
Ministry of Social Justice & Empowerment: https://socialjustice.gov.in/
National Commission for Scheduled Castes: https://www.ncsc.nic.in/
Press Information Bureau: https://www.pib.gov.in/
UNESCO Media Diversity: https://www.unesco.org/en/media-pluralism-diversity/media-diversity
स्रोत संदर्भ: भारत सरकार के PIB ने आंबेडकर के 'मूकनायक' और 'बहिष्कृत भारत' संबंधी योगदान का उल्लेख किया है; Census 2011 के सरकारी आंकड़े भारत और हिमाचल प्रदेश में SC आबादी का आधार देते हैं; तथा Press Council of India के वर्तमान पत्रकारिता आचरण मानक जाति/समुदाय के संदर्भ में सावधानी की अपेक्षा करते हैं।


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